एक नज़र में इंसान (शख़्सियत) की पहचान #सिफ़र

हमें कई बार ऐसे लोग मिलते हैं या हमारे आसपास हैं जो ये दावा करते हैं की वो एक नज़र में या एक मुलाक़ात में किसी इंसान की शख़्सियत को जान लेते हैं।  क्या वाक़ई में उन लोगों के दावे में सच्चाई है ? क्या वाक़ई में सिर्फ़ एक नज़र या मुलाक़ात में किसी इंसान की शख़्सियत को पूरी तरह समझा जा सकता है ? लोगों के इस दावे में कितनी सच्चाई है इस बात का विश्लेषण करने पर कुछ पहलु सामने आते हैं, जानते हैं विश्लेषण से सामने आये इन पहलुओं को। 
हर इंसान की शख़्सियत अलग क़िस्म की होती है, कोई ख़ुशअख़लाक़ होता है तो कोई संजीदा, तो मज़ाक़िया, कोई ग़ुस्से वाला, तो कोई शांत स्वाभाव का सबकी शख़्सियत अलग होती है।  ऐसे में हर इंसान की शख़्सियत को एक तरीक़े से नहीं आँका जा सकता। अलग-अलग हालत जैसे ख़ुशी, ग़म, परेशानी, टेंशन में हर इंसान की मानसिक स्थिति अलग-अलग होती है। 
मान लीजिये कोई इंसान ख़ुश अख़लाक़ शख़्सियत का है लेकिन अभी वो किसी परेशानी या टेंशन में है तो ज़ाहिर है उस वक़्त उसकी मानसिक स्थिति अलग होगी, ऐसे में अगर कोई उससे मिले तो उसे यही लगेगा की ये इंसान मायूसी से भरा निराशावादी शख़्सियत का है हालाँकि उस वक़्त उसकी वो हालत सिर्फ़ उसकी परेशानी की वजह से है। 
एक और पहलु पर ग़ौर करते हैं मान लीजिये वही खुश अख़लाक़ इंसान किसी वजह से बहुत ज़्यादा ग़ुस्से में है तो ज़ाहिर है इस वक़्त उसकी मानसिक स्थिति कुछ अलग होगी और हम जानते ही हैं ग़ुस्से में अक्सर इंसान का ख़ुद अपने आप पर काबू नहीं रहता, कभी-कभी गुस्से की हालत में एक शांत स्वभाव का इंसान भी हिंसक हो जाता है।  ऐसी हालत में अगर कोई उससे पहली बार मिले तो उसे यही लगेगा की ये इंसान ग़ुस्सैल और हिंसक शख़्सियत का है। 
एक पहलु पर ग़ौर करें मान लीजिये आप किसी की मैयत में गए हैं, किसी की मौत हुई है तो वहां एक सभी लोग ग़मज़दा हैं, कोई भी ख़ुश या हंसता मुस्कुराता नज़र नहीं आएगा क्योंकि वो माहौल ही ऐसा है तो इसका मतलब ये तो नहीं माना जायेगा की वो सारे लोग निराशावादी हैं।  अब यही लोग अगर शादी-पार्टी या ऐसे ही किसी और ख़ुशी के मौक़े पर मौजूद हैं तो उस वक़्त सभी  ख़ुश नज़र आएंगे।  हालाँकि कई लोग ऐसे भी होते हैं जो हर हालत में ख़ुद पर क़ाबू रख सकते हैं लेकिन ऐसे लोग बहुत काम ही होते हैं।  
कई लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी असल शख़्सियत को हर जगह या हर इंसान के सामने ज़ाहिर नहीं करते। ऐसे लोग अलग-अलग जगह और अलग-अलग लोगों के सामने अपनी एक अलग शख़्सियत ज़ाहिर करते हैं।  इन लोगों के चेहरे पर इतने नक़ाब होते है की असल में इनकी शख़्सियत क्या है उसे समझना बहुत मुश्किल है।  ये लोग अपनी झूठी शख़्सियत दिखाकर लोगों को धोखा देते हैं। ऐसे लोगों को एक नज़र या एक मुलाक़ात में समझना नामुमकिन है। 
सभी पहलुओं पर ग़ौर करें तो समझ में आता है की सिर्फ एक नज़र या एक मुलाक़ात में किसी किसी की शख़्सियत को नहीं समझा जा सकता। किसी की शख़्सियत को अच्छी तरह से जानने समझने के लिए काफी वक़्त लगता है जैसे हम अपने परिवार को, अपने दोस्तों को अच्छी तरह से समझते हैं क्योंकि हम उनके साथ लम्बे वक़्त से हैं, हमने उनके साथ ख़ुशी, ग़म, परेशानी हर तरह की हालत में वक़्त गुज़ारा है इसलिए हम उनकी शख़्सियत के सभी पहलुओं को अच्छी तरह जानते और समझते हैं। सिर्फ एक नज़र या एक मुलाक़ात में किसी इंसान की शख़्सियत को जानने समझने के दावे को सही नहीं माना जा सकता।  कुछ लोग सिर्फ अपने आप को ज़हीन और दूरदर्शी साबित करने के लिए ऐसा दावा करते हैं उनके इस दावे में कोई सच्चाई नहीं है।  
  शहाब ख़ान ''सिफ़र''

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