2019 लोकसभा चुनाव और चुनाव आयोग की भूमिका #सिफ़र

2019 लोकसभा चुनाव के सभी चरण पुरे होने वाले हैं।  23 मई को चुनाव परिणाम आना है।  सभी राजनैतिक पार्टियां जीत के दावे कर रही है। हर बार चुनाव में कोई एक राजनैतिक पार्टी जीतती है और कोई हारती है, चुनाव में राजनैतिक पार्टयों की जीत हार का सिलसिला चलता रहा है।  जनता एक पार्टी से निराश होकर दूसरी पार्टी को चुनती है तो अगले चुनाव में वर्तमान पार्टी से निराश होकर फिर से पहले वाली पार्टी को चुन लेती है, लोकतंत्र में ऐसा सालों से चला आ रहा है।  चुनाव में जनता राजनैतिक पार्टियों से अपनी नाराज़गी जनादेश के माध्यम से ज़ाहिर कर देती है। कोई भी राजनैतिक पार्टी हारे या जीते लेकिन चुनाव आयोग पर जनता का विश्वास क़ायम रहा। पूर्व में टी एन शेषन ने चुनाव आयुक्त के रूप में अपने काम के ज़रिये चुनाव आयोग को उसके अधिकार और ताक़त का अहसास कराया और जनता के बीच चुनाव आयोग की विश्ससनीयता को और मज़बूत बनाया।  

  
वर्तमान चुनाव में चुनाव आयोग की जो दुर्दशा हो रही है वो चिंताजनक है। देश में पहली बार चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली शक के दायरे में आ गई है। अधिसूचना जारी होने से लेकर अभी तक लगातार चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। सबसे पहले तो अलग-अलग चरणों में चुनाव कार्यक्रम को लेकर ही विवाद उठने लगे थे। कई राज्यों में चुनाव ज़्यादा चरणों में कराने को लेकर सरकार की सुविधा के अनुसार चुनाव कार्यक्रम तय करने के आरोप लगे।    

चुनाव आयोग द्वारा चुनाव प्रचार में सेना के नाम के इस्तेमाल की पाबन्दी के बावजूद भी प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार में कई बार सेना और शहीद जवानों के नाम पर वोट माँगा, कई पूर्व चुनाव आयुक्त और संविधान विशेषज्ञों ने भी माना की प्रधानमंत्री आचार संहिता का उलंघन कर रहे हैं इसके बावजूद भी  चुनाव आयोग द्वारा प्रधानमंत्री को अनेकों बार आचार संहिता के उलंघन की शिकायत के बावजूद भी क्लीनचिट दी गई। प्रधानमंत्री को आचार संहिता के उलंघन के मामले में क्लीनचिट दिए जाने पर एक चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की असहमति को भी दरकिनार किया गया।  चुनाव ड्यूटी के दौरान प्रधानमंत्री के सामान में  मौजूद एक संदिग्ध बक्से के तलाशी लेने पर एक आई.ए.एस. ऑफिसर को निलंबित कर दिया जाता है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक, वेब सीरीज़ और नमो चैनल पर कार्यवाही नहीं की गई फिर जब बाद में मामला सुप्रीमकोर्ट तक पहुंचा और चुनाव आयोग पर कार्यवाही का दबाव बना तब जाकर बायोपिक, वे वेब सीरीज़ और नमो चैनल पर पाबन्दी लगाई गई। 

राजयपाल कल्याण सिंह को  आचार संहिता के उलंघन का दोषी पाए जाने के बाद कार्यवाही करने के बजाये मामला राष्ट्रपति को भेज दिया गया जिस पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गई।  बीजेपी की भोपाल लोकसभा सीट की उम्मीद्वार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर द्वारा शहीद हेमंत करकरे पर विवादस्पद बयान देने के बावजूद सख्त कार्यवाही करने के बजाये सिर्फ कुछ समय के लिए चुनाव प्रचार पर रोक लगाई गई हालाँकि उसके बाद भी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर चुनाव प्रचार करती रहीं जिसकी शिकायत भी चुनाव आयोग से होने के बावजूद भी कार्यवाही नहीं की गई। 



चुनाव में आचार संहिता  के उलंघन की शिकायतों के मामले में भी विपक्ष के साथ पक्षपात के आरोप लगते रहे।  पश्चिम बंगाल में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के मामले में चुनाव आयोग ने निर्धारित समय से पहले चुनाव प्रचार पर रोक लगाने में पक्षपात नज़र आता है, अगर चुनाव प्रचार पर रोक लगानी थी तो तुरंत लगनी चाहिए थी लेकिन ऐसा करने के बजाये प्रधानमंत्री को रैली करने के बाद बाद का समय चुनाव प्रचार पर रोक लगाई गई।  इस चुनाव में चुनाव आयोग ने अपनी विश्ससनीयता खोई है।  एक निष्पक्ष संस्था के रूप में उसकी साख घटी है।  चुनाव आयोग जिसे लोकतंत्रिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने का गौरव प्राप्त था आज वही चुनाव आयोग सरकार के दबाव में लाचार, बेबस नज़र आ रहा है, 23 मई को चुनाव में चाहे किसी भी पार्टी को जीत मिले, किसी भी पार्टी की सरकार बने लेकिन लोकतंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले चुनाव आयोग की  चुनाव में अपनी संदेहास्पद कार्यप्रणाली इतिहास में दर्ज हो जाएगी जिसे भुलाया नहीं जा सकेगा।  


शहाब ख़ान ''सिफ़र''





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